Ajay Singh – Faridabad
ग्रामीण भारत में स्कूली शिक्षा की स्थिति आज भी गंभीर और चिंताजनक बनी हुई है। नामांकन और बुनियादी सुविधाओं में सुधार के बावजूद बच्चों की पठन, लेखन और गणितीय क्षमताओं में लगातार गिरावट देखी जा रही है। यह तथ्य ASER (Annual Status of Education Report) 2018 में स्पष्ट रूप से सामने आया है।
ASER रिपोर्ट 2018 क्या कहती है?
ASER 2018 रिपोर्ट देश के 596 जिलों, लगभग 3.5 लाख ग्रामीण परिवारों और 16,000 से अधिक स्कूलों के सर्वेक्षण पर आधारित है। इस रिपोर्ट में ग्रामीण भारत में स्कूली शिक्षा की पहुंच, गुणवत्ता और बुनियादी सुविधाओं का गहन विश्लेषण किया गया है।
रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष:
- 6 से 14 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 95% बच्चे स्कूलों में नामांकित हैं
- 11–14 वर्ष की विद्यालय न जाने वाली लड़कियों का प्रतिशत मात्र 4.1%
- निजी स्कूलों में नामांकन 2014–2018 के बीच 30–31% के आसपास स्थिर
- नामांकन बढ़ा है, लेकिन सीखने की गुणवत्ता घटी है
शिक्षा के अधिकार कानून के बाद आए सकारात्मक बदलाव
शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 लागू होने के बाद:
- सरकारी स्कूलों में नामांकन बढ़ा
- शौचालय, खेल मैदान, भवन जैसी सुविधाओं में सुधार
- शिक्षकों की नियुक्ति और प्रशिक्षण पर जोर
लेकिन इन सबके बावजूद एक-चौथाई सरकारी स्कूलों में नामांकन 60% से भी कम है।
बच्चों की सीखने की क्षमता: चिंताजनक स्थिति
ASER रिपोर्ट के अनुसार:
- वर्ष 2008 में कक्षा 8 के 85% बच्चे कक्षा 2 की किताब पढ़ सकते थे
- 2018 में यह संख्या घटकर 73% रह गई
- कक्षा 8 के केवल 44% बच्चे साधारण गणितीय भाग कर पाने में सक्षम
यह गिरावट स्कूली शिक्षा की प्रभावशीलता पर बड़ा सवाल खड़ा करती है।
निजी स्कूल क्यों बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं?
2018 के आंकड़ों के अनुसार:
- सरकारी स्कूलों में कक्षा 5 के 44% बच्चे कक्षा 2 स्तर की पढ़ाई कर पाते हैं
- निजी स्कूलों में यह आंकड़ा 66% है
इसका मुख्य कारण:
- अभिभावकों की शैक्षिक और आर्थिक स्थिति
- घर में पढ़ाई का सहयोगी वातावरण
- स्कूल और घर – दोनों जगह सीखने का अवसर
सांस्कृतिक और सामाजिक असमानता भी बड़ी वजह
ग्रामीण शिक्षा में लिंग, जाति, भाषा, क्षेत्र और धर्म जैसी सामाजिक संरचनाएं सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं। जैसे ही अवसर मिलता है, ग्रामीण निजी स्कूलों के अभिभावक बच्चों को शहर के स्कूलों में भेज देते हैं, जिससे गांवों में शिक्षा की गुणवत्ता और गिरती जाती है।
ग्रामीण प्राथमिक शिक्षा की प्रमुख समस्याएं
- कई स्कूलों में आज भी कमरे, डेस्क और बेंच की कमी
- बच्चे बरामदों या पेड़ों के नीचे पढ़ने को मजबूर
- पीने के पानी और शौचालयों में स्वच्छता का अभाव
- समय पर निःशुल्क पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध नहीं
- मिड-डे मील के संचालन में शिक्षकों का समय नष्ट
- स्मार्ट क्लास और एडूसेट उपकरण सिर्फ शो-पीस बने
- शिक्षकों की अनुपस्थिति और लापरवाही
- शिक्षा बजट का बड़ा हिस्सा केवल वेतन और प्रशासन पर खर्च
आगे की राह: समाधान क्या हो?
- सिर्फ नामांकन नहीं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर जोर
- शिक्षकों पर अविश्वास नहीं, बल्कि प्रशिक्षण और समर्थन
- पाठ्यक्रम का बोझ कम कर बाल-केंद्रित शिक्षा
- गांव और शहर के शिक्षा स्तर के अंतर को पाटना
- प्राथमिक शिक्षा को सबसे बड़ी प्राथमिकता देना
नई एकीकृत स्कूली शिक्षा योजना (2018–2020)
केंद्र सरकार ने 1 अप्रैल 2018 से 31 मार्च 2020 तक के लिए नई एकीकृत शिक्षा योजना लागू की, जिसमें शामिल हैं:
- सर्व शिक्षा अभियान
- राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान
- शिक्षक शिक्षा अभियान
योजना के लिए ₹75,000 करोड़ का बजट निर्धारित किया गया।
योजना के प्रमुख उद्देश्य
- गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सीखने की क्षमता में वृद्धि
- सामाजिक और लैंगिक असमानता कम करना
- प्री-नर्सरी से 12वीं तक शिक्षा की सुविधा
- शिक्षकों के प्रशिक्षण और डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा
- कौशल विकास और व्यावसायिक शिक्षा
योजना के प्रमुख लाभ
- स्कूलों का एकीकृत प्रबंधन
- स्मार्ट क्लासरूम और डिजिटल बोर्ड
- स्वच्छता और बुनियादी ढांचे में सुधार
- कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों का उन्नयन
- आकांक्षी जिलों और पिछड़े क्षेत्रों को प्राथमिकता
निष्कर्ष
ASER रिपोर्ट 2018 स्पष्ट करती है कि ग्रामीण भारत में स्कूल अब सिर्फ उपस्थिति के केंद्र बनते जा रहे हैं, सीखने के नहीं। जब तक शिक्षा की गुणवत्ता, सामाजिक समानता और शिक्षक सशक्तिकरण पर गंभीर प्रयास नहीं होंगे, तब तक शिक्षा का मूल उद्देश्य अधूरा ही रहेगा।